
लिंग थापि बिधिवत करि पूजा।
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
भस्म ललाट पे, रुद्र की रेखा।
हर हर बोलूँ, मिटे मन की लेखा॥
जल चढ़ाऊँ, बेल चढ़ाऊँ।
मन की सारी गांठें खोलूँ॥
डमरू धुन में ध्यान लगाऊँ।
भोले तेरे चरणों में आऊँ॥
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा।
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
तेरी शरण में पावन बूजा।
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
कंठ में सर्प, जटा में गंगा।
भक्तों के रखवाले, तुम ही दंगा॥
विष भी पीकर अमृत बाँटा।
दुखिया का तूने हाथ पकड़ा॥
धूप जलाऊँ, दीप जलाऊँ।
तेरे नाम की ज्योत सजाऊँ॥
मन का भय अब दूर भगाऊँ।
भोले तेरे द्वार पे गाऊँ॥
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा।
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
तेरी शरण में पावन बूजा।
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
अर्धनारीश्वर, रूप अनोखा।
करुणा का तेरे अंत न देखा॥
त्रिशूल धरे, संकट टाले।
भक्त पुकारे, तू ही संभाले॥
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा।
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥
हर हर महादेव, मन मेरा पूजा।
शिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥