
रात थी खामोश, चाँद भी था दूर
सुनसान रास्ते, दिल था मजबूर
एक आवाज़ आई, जैसे कोई पुकारे
“वापस आ जाओ… हम हैं तुम्हारे।”
मैंने मुड़कर देखा, कोई वहाँ नहीं था
बस ठंडी हवा थी, और अंधेरा था
गली के मोड़ पर, सन्नाटा हँसा
जैसे मेरे नाम का किसी ने मज़ाक किया
दीवार पे साया था, टेढ़ा-सा खड़ा
आँखों में खिलौने-सा डर था भरा
फिर वही आवाज़ आई, धीमे से कहकर
“तुम भूल गए क्या… मुझे?”
मैंने कहा, “कौन हो?”
वो बोला, “याद कर”
टूटा हुआ पल हूँ
तेरे दिल के अंदर
तू कहाँ, तू कहाँ
मेरी आख़िरी मुलाक़ात
तू कहाँ, तू कहाँ
क्यों हुई ये रात
तू कहाँ, तू कहाँ
अब भी तेरा इंतज़ार
तू कहाँ, तू कहाँ
दे गया क्यों ये वार
खिड़की के शीशे में चेहरा हिला
मेरा नहीं था, कोई और खड़ा
हँसी ऐसी आई, जैसे बच्चा रोए
और मेरे ही कदम मुझे घेरते जाएँ
जेब में रखा था पुराना-सा पत्र
नाम लिखा था, पर पन्ना था बेघर
उस पर बस इतना, स्याही में गीला
“वापस न आना, मैं अब जागा नहीं था”
मैंने कहा, “छोड़ दे”
वो बोला, “देर हो गई”
जो तूने छुपाया
वो आज खुल गई
तू कहाँ, तू कहाँ
मेरी आख़िरी मुलाक़ात
तू कहाँ, तू कहाँ
क्यों हुई ये रात
तू कहाँ, तू कहाँ
अब भी तेरा इंतज़ार
तू कहाँ, तू कहाँ
दे गया क्यों ये वार
फिर एक झटका-सा, सब कुछ झुका
घड़ी की सुई ने नाम मेरा लिया
मैंने आँखें बंद कीं, साँसें थमीं
और दूर से आई वही पुरानी हँसी
“अब मत देखो पीछे,” वो फुसफुसाया
“जो खो दिया था, वो लौट के आया”
मैंने कहा, “अगर सच में तू यहाँ है”
“तो सामने आ… और बता, मैं कौन था?”
तू कहाँ, तू कहाँ
मेरी आख़िरी मुलाक़ात
तू कहाँ, तू कहाँ
क्यों हुई ये रात
तू कहाँ, तू कहाँ
अब भी तेरा इंतज़ार
तू कहाँ, तू कहाँ
दे गया क्यों ये वार
रात थी खामोश, चाँद भी था दूर
और मेरी आवाज़ थी, बहुत मजबूर
एक साया हँसा, फिर धुंध में खो गया
“वापस आ जाओ…” कहके सो गया