
अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ
अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ
आखरी वक्त में क्या रौनक-ए-दुनिया देखूँ
अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ
इसने भी मदीना देख लिया, उसने भी मदीना देख लिया
सरकार कभी तो मैं भी कहूँ, मैंने भी मदीना देख लिया
अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ
जाऊँ मैं शहर-ए-नबी गुंबद-ए-ख़ज़रा देखूँ
और फिर कब्र-ए-हसन, तुर्बत-ए-ज़हरा देखूँ
अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ
जालियाँ देखूँ कि दीवार-ओ-दर-ओ-बाम-ए-हरम
अपनी माज़ूर निगाहों से मैं क्या-क्या देखूँ
मैं कहाँ हूँ ये समझ लूँ तो उठाऊँ नज़रें
दिल ज़रा सँभले तो मैं जानिब-ए-ख़ज़रा देखूँ
मेरे मौला! मेरी आँखें मुझे वापस कर दे
ताकि इस बार मैं जी भर के मदीना देखूँ
अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ
काश इक़बाल यूँ ही उम्र बसर हो मेरी
सुब्ह काबे में हो और शाम को तैबा देखूँ
अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ
एक रोज़ होगा जाना सरकार की गली में
होगा वही ठिकाना सरकार की गली में
अब तो बस एक ही धुन है कि मदीना देखूँ