
सागर तट पर वीर खड़े थे,
सामने सिंधु अपार।
लंका थी उस पार कहीं,
पर कौन करे यह पार॥
एक-एक कर वीरों ने,
अपनी शक्ति बतलाई।
पर मौन खड़े थे पवनपुत्र,
मानो सुधि अपनी बिसराई॥
तब जामवंत ने पहचान लिया,
उस वीर का सोया बल।
बोले—तुममें बल अपार,
काँपे जिससे सारा संसार॥
तुममें पर्वत उठाने का बल,
तुममें नभ को छूने की उड़ान।
तुम ही हो रघुवर के दूत,
तुम ही हो महावीर हनुमान॥
बाल्यकाल की लीला याद करो,
जब सूर्य लगा था फल समान।
आकाश चीरकर दौड़े थे तुम,
देख चुका है जग तुम्हारा बल अपार॥
देवों ने दिए थे वर अनगिन,
किससे छिपा तुम्हारा पराक्रम।
आज समय है जागो वीर,
रामकाज में अर्पित कर दो तन-मन॥
भूल नहीं, बस सोई थी शक्ति,
भूला था केवल अपना ज्ञान।
राम नाम ने छुआ हृदय को,
जाग उठा पवनपुत्र महान॥
ॐ श्री हनुमते नमः।
ॐ श्री रामदूताय नमः।
ॐ अंजनीसुताय नमः।
ॐ पवनपुत्राय नमः॥
रोम-रोम में राम समाए,
नस-नस में भर गया तेज।
हृदय में जागी सुप्त शक्ति,
नेत्रों में दहका अंगार॥
धरती काँपी, पर्वत डोले,
गर्जन से गूँजा आसमान।
लघु तन से विराट हुए फिर,
जाग उठा बजरंग महान॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं,
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं,
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
गगन चीरता उठा स्वर,
गूँजा जय श्रीराम।
दिशा-दिशा में गूँज उठा,
पवनपुत्र का जयगान॥
नभ से ऊँचा रूप हुआ,
सागर से गहरी शान।
चरणों में धरती डोली,
मस्तक छूने लगा आसमान॥
जहाँ भक्ति बन जाए शक्ति,
वहाँ असंभव क्या काम?
जिसके हृदय में राम बसे हों,
उसके लिए कहाँ विश्राम॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं,
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं,
श्रीरामदूतं शिरसा नमामि॥
सागर अब बाधा नहीं था,
लंका अब दूर नहीं।
जिसने खुद को पहचान लिया हो,
उससे बड़ी कोई शक्ति नहीं॥
उठा बजरंग, उठा तूफान,
जाग उठा बलवान।
रामकाज को निकले हनुमत,
काँप उठा सारा आसमान॥
पर्वत पर रखकर चरण,
तन में भर लिया वेग अपार।
रामनाम का घोष हुआ,
और छलाँग लगी उस पार॥
जय हनुमान! जय महावीर!
जय पवनसुत बलवान!
भक्ति बनी जब शक्ति प्रचंड,
जाग उठा बजरंग महान॥
श्रीराम जय राम जय जय राम,
श्रीराम जय राम जय जय राम।
रामदूत हनुमान की जय,
पवनपुत्र हनुमान की जय॥