
डॉ दीपक रावल ने कहा, मुझे जन्नत की ख़्वाइश है…
रब ने मुस्कुराकर कहा, ए आदम, ज़रा देख तो सही…
सूरज दिया, चाँद दिया, तारों का दीदार दिया…
समंदर, झील और दरिया, हर किनारे प्यार दिया…
परिंदे दिए, तितलियाँ दीं, जुगनुओं की रातें दीं…
नींद दी और ख़्वाब दिए, बारिश की सौगातें दीं…
माँ की गोद, पिता का साया, बचपन की मासूमी दी…
जवानी का जोश दिया और जीने की आज़ादी दी…
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
ये तो तेरे पास रही
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
हर साँस में, हर बात में, यही
धूप दी, दरख़्तों की छाँव, मिट्टी की खुशबू दी…
फूल, पहाड़, हवा और पानी, हर पल में जादू दिया…
सूखे होंठों को हँसी दी, टूटे दिल को रस्ता दिया…
गिरते कदमों को उठाया, हर अँधेरा हलका किया…
परिंदे दिए, तितलियाँ दीं, जुगनुओं की रातें दीं…
नींद दी और ख़्वाब दिए, बारिश की सौगातें दीं…
माँ की गोद, पिता का साया, बचपन की मासूमी दी…
जवानी का जोश दिया और जीने की आज़ादी दी…
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
ये तो तेरे पास रही
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
हर साँस में, हर बात में, यही
फिर रब ने धीरे से कहा—
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
तेरे घर की दहलीज़ में
तेरी आँखों की नमी में
तेरे अपने हर यक़ीन में
जन्नत तेरे ही करीब रही
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
ये तो तेरे पास रही
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
क्यों ढूँढ़े जन्नत कहीं
हर साँस में, हर बात में, यही