
यमुना किनारे, रात घनी थी
हवा में जैसे, एक पुकार बही थी
मथुरा की गलियों में, सन्नाटा खड़ा था
पर एक शिशु के नाम से, भाग्य डरा था
मां की आंखों में, विश्वास जगा था
कैद की दीवारों में, उजाला रचा था
क्योंकि वही तो आया था, धरती का सहारा
जिसके कदमों से हिलता, अंधेरा सारा
राजमहल कांपा
शंख-सा स्वर उठा
मौन ने भी पूछा
अब कौन बचा?
कृष्ण, कृष्ण, गिरिधर प्यारे
तेरे नाम से कट जाएं सारे अंधियारे
कृष्ण, कृष्ण, मुरली वाले
तेरी लीला से टूटें जाल ये काले
कृष्ण, कृष्ण, हे नंदलाल
तेरे चरणों में झुके काल
कृष्ण, कृष्ण, गिरिधर प्यारे
तेरे नाम से कट जाएं सारे अंधियारे
गोवर्धन उठा तो, पर्वत भी बोला
एक बालक की भक्ति में, जग झुक डोला
गोकुल की छाती पर, बरखा घिरी थी
पर आंखों में लोगों की, श्रद्धा जगी थी
एक हाथ, एक पर्वत
और भीतर अपार बल
जैसे करुणा ने पहन ली
विजय की धवल शाल
पांवों के नीचे
धरती थम गई
भय की हर सांस
वहीं दम गई
कृष्ण, कृष्ण, गिरिधर प्यारे
तेरे नाम से कट जाएं सारे अंधियारे
कृष्ण, कृष्ण, मुरली वाले
तेरी लीला से टूटें जाल ये काले
कृष्ण, कृष्ण, हे नंदलाल
तेरे चरणों में झुके काल
कृष्ण, कृष्ण, गिरिधर प्यारे
तेरे नाम से कट जाएं सारे अंधियारे
और जब कुरुक्षेत्र की, धूल उठी
धर्म की आंखों में, आग बुझी
तब मौन में बोला, एक दिव्य सार
कर्तव्य से बड़ा नहीं, कोई संसार
न तू अकेला है
न तू असहाय
मैं हूं भीतर तेरे
हर श्वास में आए
कृष्ण, कृष्ण, गिरिधर प्यारे
तेरे नाम से कट जाएं सारे अंधियारे
कृष्ण, कृष्ण, मुरली वाले
तेरी लीला से टूटें जाल ये काले
कृष्ण, कृष्ण, हे नंदलाल
तेरे चरणों में झुके काल
कृष्ण, कृष्ण, गिरिधर प्यारे
जय हो तेरी, जय हो मुरलीधारे