
एक गाँव में मोहन था
गरीब था पर सच्चा था
रोज़ कमाकर लाता
घर का चूल्हा जलाता
एक दिन धूल भरी राह में
उसे बटुआ पड़ा मिला
पैसों से भरा था वह
और नाम लिखा हुआ मिला
मन में एक पल लालच आया
पर सच ने उसे जगाया
ये पैसे मेरे नहीं हैं
ये बोझ मुझे नहीं भाया
ईमानदारी का इनाम
ईमानदारी का नाम
जो सच्चा हो दिल से
मिलता है बड़ा सम्मान
ईमानदारी का इनाम
ईमानदारी का नाम
मोहन ने सच चुना
और जीत लिया सारा जहाँ
वह गाँव-गाँव घूमता रहा
मालिक को ढूँढता रहा
हर दरवाज़े पर पूछता
हर चेहरे को देखता रहा
फिर एक कोने में देखा
एक बूढ़ा रोता हुआ
काँपते हाथों में चेहरा
टूटा-सा खोया हुआ
बूढ़े ने धीमे से कहा
मेरी जमा-पूँजी गई
सारी उम्र की कमाई
मुझसे कहीं खो गई
ईमानदारी का इनाम
ईमानदारी का नाम
जो सच्चा हो दिल से
मिलता है बड़ा सम्मान
ईमानदारी का इनाम
ईमानदारी का नाम
मोहन ने सच चुना
और जीत लिया सारा जहाँ
मोहन ने बटुआ खोला
एक-एक चीज़ मिलाई
पहचान पत्र देखा
और आँखें नम हो आईं
बूढ़े के हाथों में देकर
उसने बस इतना कहा
आपकी मेहनत की कमाई
मैं लौटा रहा हूँ, बाबा
ईमानदारी का इनाम
ईमानदारी का नाम
जो सच्चा हो दिल से
मिलता है बड़ा सम्मान
ईमानदारी का इनाम
ईमानदारी का नाम
मोहन ने सच चुना
और जीत लिया सारा जहाँ