
तक़दीर के फ़ैसले मुझको नोचते रहे,
ज़ख़्मों के नाम पूछे, तमाशे होते रहे।
मैंने हँसी पहन ली कि महफ़िल न बुझ सके,
अंदर मगर कई दरवाज़े रोते रहे।
मुझसे कहा गया है, ख़ुश रहा करूँ,
टूटे हुए दिल को भी हँसा करूँ।
जो दर्द मेरी रूह में घर कर गया,
उससे भला मैं कैसे जुदा करूँ?
चिट्ठी में माँ ने बस यही लिखा था—आना,
मैंने जवाब टाल दिया, क्या कहता, जाना?
जेबों में रखे थे कुछ पुराने बहाने,
चेहरे पे फिर भी था वही मुस्कुराना।
मुझसे कहा गया है, ख़ुश रहा करूँ,
टूटे हुए दिल को भी हँसा करूँ।
जो दर्द मेरी रूह में घर कर गया,
उससे भला मैं कैसे जुदा करूँ?
एक दिन थककर मैंने आईने से कहा,
अब और नहीं, ये झूठ निभाना नहीं।
आँसू भी अपने हैं, इन्हें बहने तो दे,
हर दर्द को हँसकर छुपाना नहीं।
तक़दीर के फ़ैसले अपना असर रखेंगे,
हम भी मगर अब ख़ुद की ख़बर रखेंगे।